आज फिर वही दिन है,
न जाने क्यूँ लगता है साफिर,
गूम है आज हवा , रगों में है चुभन,
तन्हाई है इन साँसों में, दर्द में है ये दिल,
क्यूँ दिखे नहीं मंजिल, लग रहा आज फिर वही दिन है ।
सुबह की ताजगी भी है जुदा ,
दिन लग रहे है धूमिल , वही कशिश है पुराने दिनों की,
आज फिर से नल में पानी नहीं है,
अब आई है फिर से बारी,
अंडर pressure परफोर्म करने की पारी,
है वक़्त की ये गुजारिश,
किसी तरह कटे ये दिन बिन पानी , बिन बारिश।
P.S. : A morning in Gurgaon that left me frustrated and reminded me of my earlier college days. Kudos to all my roomies!!
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